बलबन और उसका सम्पूर्ण इतिहास | गुलाम वंश का अंत | Balban Ka Itihas |

 

ऐतिहासिक तथ्य

फुतुह उस सलातीन

फुतुह उस सलातीन ग्रन्थ की रचना इसामी ने अलाउद्दीन बहमनशाह (बहमनी राज्य का संस्थापक) के दरबार में की थी जिसमें 999 ई. से लेकर 1350 ई. तक के इतिहास का वर्णन किया गया है | फुतुह उस सलातीन ग्रन्थ में दिल्ली सल्तनत के शासक मुहम्मद बिन तुगलक की खूब आलोचना की गई जिसमें उसे क्रूर और निर्दयी तक कहा गया है |

किताब ए रेहला

किताब ए रेहला जिसे अधिकतर भारतीय इतिहासकारों ने केवल रेहला के नाम से सम्बोधित किया है | रेहला ग्रन्थ की रचना अफ़्रीकी यात्री इब्नबतूता ने अरबी भाषा में की थी जिसमें इब्नबतूता की यात्राओं का विस्तार से वर्णन किया गया है | इब्नबतूता का वास्तविक नाम शेख फ़तह अबू अब्दुल्लाह था और ये अफ्रकी देश मोरक्को के यात्री थे |

बलबन का प्रारम्भिक इतिहास

*बलबन का वास्तविक नाम गयासुद्दीन बलबन था परन्तु बचपन का नाम बहाउद्दीन था |

*बलबन के पिता इल्वारी तुर्क क़बीले के सरदार थे |

*सुल्तान इल्तुतमिश ने 1233 में बलबन को तुर्क चालीसा दल में शामिल किया था |

*सबसे पहले सुल्तान इल्तुतमिश ने बलवन को 'खासदार पद' (सुल्तान का व्यक्तिगत सेवक) प्रदान किया था।

*रज़िया सुल्तान  के शासनकाल में बलबन को 'अमीर ए आखूर' (अश्वाशाला का प्रधान) का पद प्रदान किया गया।

*अलाउद्दीन मसूदशाह के शासनकाल में बलबन को 'अमीर--हाजिब' (सुल्तान से मिलने वालों की जाँच करने वाला तथा मुख्य दरबारी अधिकारी) तथा हांसी (आधुनिक हरियाणा में) का सूबेदार बनाया गया था।

*बलबन को उलुग खां की उपाधि सुल्तान नासिरुद्दीन ने ही प्रदान की थी |

*सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में बलबन को 'नाइव ए ममलिकात' (सुल्तान के बाद सबसे सर्वोच्य अधिकारी) का पद प्रदान किया गया और 1265 में सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद बलबन को दिल्ली का शासक बनाया गया था |

बलबन का इतिहास

*बलबन ने 1266 में अपना राज्याभिषेक करवाया और दिल्ली सल्तनत का सिंहासन प्राप्त किया |

*शासक बनने के बाद बलबन ने गियासुद्दीन और नियाबत ए खुदाई (अल्लाह का प्रतिनिधि) जैसी प्रख्यात उपाधियाँ धारण कीं लेकिन बलबन के सामने उस समय कई समस्याएँ थी जिसमें पहली समस्या, जनसाधारण में सुल्तान के प्रति भय एवं सम्मान की भावना जागृत करना था |

*बलबन की दूसरी समस्या राज्य की आर्थिक स्थिति को सुधारना थी |

*बलबन की तीसरी समस्या राजस्थान तथा दिल्ली के आस - पास क्षेत्रों में मेवों (मेवाती) का आतंक था जो गरीब, मजदूर और आदिवासियों की लड़कियों का अपहरण करके उनका व्यापार करते थे |

*बलबन ने इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए लौह और रक्त की नीति अपनाई |

*बलबन ने तुर्क चालीसा दल (यानि तुरकान ए चिहालगानी) को समाप्त किया और सम्पूर्ण राज्य में सख्त कानून लागू किया |

*बलबन, सुल्तान को पृथ्वी पर नियाबत ए खुदाई (यानि अल्लाह का प्रतिनिधि) और जिल्ले अल्लाह (यानि ईश्वर का प्रतिबिम्ब) मानता था बलबन ने स्वयं का स्थान पैगम्बर के बाद माना है |

*बलबन निरंकुश शासन में विश्वास रखता था उसका मानना था केवल निरंकुश शासक ही अपनी प्रज्ञा को आज्ञापालन प्राप्त करवा सकता था |

*बलबन ने अपने पुत्र बुगरा खां से कहा था सुल्तान का पद निरंकुशता का सजीव प्रतीक है |

*बलबन ने फ़ारसी पद्धति पर अपने दरवार का गठन किया था |

*बलबन दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने दरवार में गैर - इस्लामी प्रथाओं का प्रचलन शुरू किया |

*बलबन ने अपने दरवार में सिज़दा (घुटनों पर बैठकर सिर झुकाना) और पायबोस (सुल्तान का चरण चूमना) की प्रथा प्रारम्भ की थी |

*बलबन ने ही ईरानी त्यौहार नवरोज़ या नौरोज़ मनाने की प्रथा भी आरम्भ की थी |

*बलबन ने अपने सिक्कों पर खलीफ़ा का नाम भी अंकित करवाया था | 

बलबन के प्रशासनिक सुधार

*सर्वप्रथम बलबन ने ही सदैव तत्पर सेना रखने की शुरुआत की |

*सर्वप्रथम बलबन ने ही दीवाने ए आरिज़ (यानि सेना विभाग) की स्थापना की और इमादुलमुल्क को उसका मंत्री बनाया था |

*बलबन के शासन की सफलता का मुख्य आधार उसका बरीद ए मुमालिक (गुप्तचर विभाग) को माना जाता है |

*बलबन दिल्ली सल्तनत पहला शासक था जिसने मंगोलों के भय से पश्चिमोत्तर सीमा पर किले बनवाना प्रारम्भ किया था |

*1286 में तिमूर के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया और इस आक्रमण का सामना शहजादा मुहम्मद ने किया तथा इसी युद्ध में शहजादा मुहम्मद की मृत्यु हो गई |

*शहजादा मुहम्मद के ही संरक्षण में अमीर खुसरो और अमीर हसन ने अपना साहित्यिक जीवन आरम्भ किया था |

*शहजादा मुहम्मद बलबन का बड़ा पुत्र एवं उत्तराधिकारी था लेकिन उसकी मृत्यु के बाद बलबन ने उसे शहीद ए आज़म की उपाधि प्रदान की |

*सर्वप्रथम बलबन ने ही सेना को नकद वेतन की व्यवस्था शुरू की थी |

*सर्वप्रथम बलबन ने ही मृत सैनिकों की विधवाओं एवं उनके बच्चों के लिए आर्थिक सहायता की शुरुआत की थी |

*सर्वप्रथम बलबन ने ही सेना का केन्द्रीकरण किया था |

*सर्वप्रथम बलबन ने ही योग्य व सक्षम व्यक्तियों को सेना में भर्ती करने की शुरुआत की थी |

बलबन की मृत्यु

*बलबन की मृत्यु 1286 - 87 में हुई थी मृत्यु के बाद राज्य के अधिकारयों ने दुखी होकर 40 दिनों तक शोक मनाया था |

*बलबन का शासनकाल 1266 – 1287 के मध्य माना जाता है |

बलबन के उत्तराधिकारी

*बलबन ने अपना उत्तराधिकारी शहजादा मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को चुना था लेकिन बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली के कोतवाल फखरुद्दीन मुहम्मद ने एक षड्यंत्र के तहत कैखुसरो को मुल्तान (आधुनिक पाकिस्तान) का सूबेदार बनवा दिया और बुगरा खां के पुत्र कैकुबाद को दिल्ली का सुल्तान बनवा दिया था |

*उस समय कैकुबाद की उम्र 18 वर्ष थी और इसी का लाभ फखरुद्दीन मुहम्मद के दामाद निजामुद्दीन ने उठाया |

*निजामुद्दीन ने कैकुबाद को इतना भोग - विलाषी बना दिया था कि उसने दिल्ली के निकट किलोखरी की स्थापना करके वहीँ पर निवास करना शुरू कर दिया |

*कैकुबाद के समय में शासन की बागडोर निजामुद्दीन के हाथों में रही तथा कुछ समय बाद कैकुबाद और निज़ामुद्दीन के बीच मतभेद हो गए एवं कैकुबाद ने निजामुद्दीन की हत्या करवा दी थी |

*निजामुद्दीन की हत्या के बाद कैकुबाद ने समाना (आधुनिक पंजाब में) से फ़िरोज़ खिलज़ी (जलालुद्दीन खिलज़ी) को बुलाकर, बरन (आधुनिक बुलंदशहर) का राज्यपाल तथा आरिज़ ए मुमालिक (सेनापति) बना दिया और शाइस्ता खां की उपाधि दे दी |

*कुछ समय बाद कैकुबाद को फालिज (लकवा) मार गया और इसका लाभ विरोधी तुर्क सरदारों ने उठाया | उन्होंने तीन वर्षीय क्युमर्स को शम्सुद्दीन द्वितीय का ख़िताब देकर दिल्ली का सुल्तान बना दिया लेकिन ये बात फ़िरोज़ खिलज़ी (जलालुद्दीन खिलज़ी) को पसंद नहीं आयी और 1290 में  क्युमर्स (शम्सुद्दीन-2) की हत्या कर दी और स्वयं दिल्ली का शासक बन गया था |

*इसी के साथ इल्वारी वंश का अंत हुआ और दिल्ली पर एक नए राजवंश ख़िलज़ी - वंश की शुरुआत हुई थी | 

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