तैमूर की आत्मकथा - में हूं तैमूर - का विस्तृत वर्णन | Timur Autobiography in Hindi |

 

मैं हूं तैमूर

तैमूर की आत्मकथा 'मैं हूं तैमूर' की मूल प्रति यमन के बादशाह जाफर पाशा के पास थी । मैं हूं तैमूर की मूल प्रति से किसी लेखक ने हस्तलिखित प्रति तैयार की और उसे वह भारत लाया । वह हस्तलिखित प्रति किसी अंग्रेज अफसर के हाथों में लगी, और वह अंग्रेज अफसर उसे इंग्लैंड लेकर चला गया । अंग्रेज अफसर ने उस हस्तलिखित प्रति को डेवी नाम के एक अनुवादक को प्रदान की । डेवी ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर व्हाइट की सहायता से उसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया । 1783 में पहली बार तैमूर की आत्मकथा 'मैं हूं तैमूर' आम जनता के सामने आई ।

तैमूर जब 70 वर्ष का था तब उसने अपनी आत्मकथा में हूं तैमूर को बाएं हाथ से लिखना शुरू किया था, क्योंकि उसका दायां हाथ एक युद्ध में घायल हो गया था । तैमूर अपनी आत्मकथा पूरी होने से पहले ही मर गया था, इसके बाद उसकी आत्मकथा को इब्ने अरब शाह ने पूरा किया, परंतु इब्ने अरबशाह ने उसका नाम अजायब उल मुकर्दनी नवायब तैमूर कर दिया था । तैमूर की आत्मकथा मैं हूं तैमूर का हिंदी में अनुवाद संजना कोल के द्वारा किया गया है । मैं उसी को आप सभी को पढ़ा रहा हूं और इसका उर्दू में अनुवाद खलील उल रहमान तथा डॉ हमीद यजदानी ने किया था ।

तैमूर का प्रारंभिक इतिहास

*नाम - तैमूर या तिमूर (जिसका अर्थ पृथ्वी को हिलाने वाला या लोहा होता है)

*पूरा नाम - शुजा उल दीन तैमूर ।

*जन्म - 9 अप्रैल 1336 को आधुनिक उज्बेकिस्तान के शहर ए सब्ज (कैश) में हुआ था ।

*पिता का नाम - तुरकाई (कैश शहर के सामंत थे)

*माता का नाम - तकीना खातून ।

*राजवंश - तैमूरी राजवंश

*मृत्यु - 18 फरवरी 1405 को आधुनिक कजाकिस्तान के ओट्रार में जिसे फराब भी कहा जाता है ।

*समाधि/कब्र - समरकंद, उज़्बेकिस्तान ।

*तैमूर का पहला शिक्षक मुल्ला अलीबेग था, जिसने उसे प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की थी ।

*तैमूर का दूसरा शिक्षक शेख शम्स उद दीन था, जिसने उसे कुरान की शिक्षा प्रदान की थी ।

*तैमूर ने शेख शम्स उद दीन से शिक्षा प्राप्त करने के बाद अब्दुल्ला कुतुब के मदरसे में शिक्षा प्राप्त की । जहां पर उसने अपने सहपाठी योलास की हत्या कर दी थी, क्योंकि योलास उसे पसंद नहीं करता था । हत्या के बाद अब्दुल्ला कुतुब ने यासा कानून के तहत तैमूर को बचा लिया था ।

*यासा या यसालो चंगेज खान के शासनकाल में लागू किया गया कानून था । उस समय उन देशों में, इसी कानून का पालन किया जाता था । यासा एक मंगोल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ कानून होता है । इसी कानून के तहत तैमूर चंगेज खान से अपना संबंध जोड़ता था, क्योंकि तैमूर के पूर्वजों ने चंगेज खान के उत्तराधिकारियों की पुत्री के साथ निकाह किया था । तैमूर के पूर्वजों में लराशर नोबान पहला व्यक्ति था जिसने इस्लाम को कुबूल किया था ।

*अजरबैजान के शहर शविस्तर में जन्मे सैयद उद दीन महमूद शबिस्तरी की किताब गुलशन ए राज से तैमूर बहुत प्रभावित था ।

*बल्ख में जन्मे मौलाना जलालुद्दीन रोमी की पुस्तक मसनबी को तैमूर ने पढ़ा, परंतु तैमूर रोमी से बहुत नफरत करता था क्योंकि रोमी धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करने वाला था । तैमूर को धार्मिक स्वतंत्रता बिल्कुल पसंद नहीं थी । शुरुआत से ही उसके दिमाग में इस्लामिक कट्टरता को भरा गया था, इसीलिए उसे इस्लाम के अलावा दुनिया में कोई भी मजहब सर्वश्रेष्ठ दिखाई नहीं देता था ।

*तैमूर ने 1380 से 1396 की मध्य आधुनिक अफगानिस्तान, खुरासान, सीस्तान, फारस, अजरबैजान, कुर्दिस्तान, मेसोपोटामिया आदि पर विजय प्राप्त कर ली थी । इन्हीं विजयों से उत्साहित होकर तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया था ।

तैमूर का भारत पर आक्रमण

मैं अपनी सेना को लेकर समरकंद से निकला । सबसे पहले मैंने आसमान की तरफ देखकर कहा - अल्लाह तू जानता है कि मैं तलवार के घाव या मौत के ख्याल से नहीं डरता हूं । में आज जो कुछ भी कह रहा हूं वो डर की वजह से नहीं कह रहा, क्योंकि मैं जानता हूं । वीर पुरुष का विस्तर लड़ाई का मैदान होता है । एक मर्द को लड़ाई के मैदान में ही मौत आनी चाहिए । अगर मैं इस सफ़र से वापस आ सका और समरकंद पहुंचने तक मेरी जिंदगी बची रही, तो मैं इस शहर में तेरी इबादत के लिए, ए मेरे अल्लाह एक आलीशान मस्जिद बनाऊंगा ।

समरकंद से तैमूर काबुल पहुंचा । ग़ौर का शासक अब्दुल कल्जाई था । अब्दुल कल्जाई अपने प्रसिद्ध 20 हजार सैनिकों के साथ तैमूर की सेना में शामिल हुआ । अब तैमूर की सेना की संख्या 1 लाख 20 हजार हो गई थी । तैमूर काबुल से अपनी सेना लेकर कंधार की तरफ निकलने वाला ही था परंतु उससे पहले कंधार का शासक स्वयं तैमूर के पास पहुंच गया । कंधार के शासक ने तैमूर का स्वागत किया । तैमूर ने उससे पूछा, क्या हिंदुस्तान जाने के लिए खैबर के दर्रे से ही जाना पड़ेगा और कोई रास्ता नहीं है? इस पर कंधार के शासक ने कहा - नहीं अमीर ! अगर यहां से कोई पंजाब जाना चाहे, तो उसे खैबर का दर्रा जरूर पार करना पड़ता है ।

कंधार के शासक ने तैमूर को 12 मार्गदर्शक दिए जो तैमूर के साथ मुल्तान तक आए । तैमूर कंधार से खैबर दर्रे को पार करके क्वेटा पहुंचा । उस समय क्वेटा शासक अब्दुल्ला वली उल मुल्क था । वली उल मुल्क ने तैमूर का स्वागत किया और पूछा - अमीर तू कहां जाना चाहता है, और तेरा क्या करने का इरादा है? इस पर तैमूर ने जवाब दिया - मैं हिंदुस्तान को जीतकर उसे अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाना चाहता हूं । वली उल मुल्क बोला - अमीर तू हिंदुस्तान को जीतने का ख्याल छोड़ दे ।

तैमूर ने कारण पूछा - वली उल मुल्क बोला - हिंदुस्तान में 2 हजार बादशाह हैं, अगर खुदा तुझे 100 साल की उम्र भी दे, और तू अपनी पूरी उम्र लड़ता रहे । तब भी तू पूरे हिंदुस्तान को नहीं जीत सकता । इस पर तैमूर ने कहा - तो फिर महमूद गजनबी ने पूरे हिंदुस्तान को कैसे जीत लिया था? वली उल मुल्क बोला - अमीर महमूद गजनबी ने हिंदुस्तान का सिर्फ एक कोना ही जीत पाया था । तुझे मालूम है कि हिंदुस्तान कितना विशाल देश है । कैसी कैसी जातियां वहां पर निवास करती हैं । हिंदुस्तान के एक कोने पर बेहद सर्दी पड़ती है, तो दूसरे कोने पर बेहद गर्मी पड़ती है । हिंदुस्तान में एक कोने के लोग गाय को पवित्र मानते हैं, और दूसरी कोने के लोग जिंदा आदमी को खा जाते हैं । इस पर तैमूर ने कहा - यह सारी चीजें मुझे हिंदुस्तान पर विजय प्राप्त करने से नहीं रोक सकती । मैं वो शासक हूं जिसने आधी दुनिया को अपने अधीन कर लिया है, फिर हिंदुस्तान क्या चीज है ।

वली उल मुल्क ने कहा - अमीर मुझे तेरी बहादुरी पर शक नहीं है । मैंने तेरी बहादुरी के किस्से सुने हैं, परंतु तेरा हिंदुस्तान को जीतने का ख्वाब पूरा नहीं होगा । तू हिंदुस्तान के सारे बादशाहो पर विजय हासिल कर सकता है, परंतु वहां की महामारी पर विजय हासिल नहीं कर सकता । हिंदुस्तान की महामारी वहां के लोगों पर असर नहीं करती है, परंतु दुश्मन सेनाओं को जिंदा नहीं छोड़ती । वली उल मुल्क की बातें सुनकर तैमूर जोर से हंस पड़ा और बोला - अगर तू उम्र में मुझसे बड़ा नहीं होता, तो मैं तेरा आदर नहीं करता । मुझे लगता है तेरी मत मारी गई है ।

क्वेटा से तैमूर मुल्तान पहुंचा । उस समय मुल्तान का राजा पनशन जंग था । पनशन जंग हिंदू राजा था, परंतु उसने तैमूर की अधीनता स्वीकार कर ली थी । उस समय हिंदुस्तान की सीमा मुल्तान से ही शुरू होती थी । तैमूर ने पनशन जंग से दिल्ली के बारे में पूछा । पनशन जंग को जो दिल्ली के बारे मालूम था, उसने सब कुछ तैमूर को बता दिया । अभी दिल्ली का सुल्तान मल्लू इकबाल है । दिल्ली का वास्तविक सुल्तान महमूद खिलजी था, परंतु मल्लू इकबाल ने जबरजस्ती दिल्ली की सत्ता पर कब्जा कर लिया है । महमूद खिलजी को जेल में डाल दिया । मल्लू इकवाल के पास दो हजार हाथी हैं, परंतु सेना के बारे में मुझे जानकारी नहीं है ।

तैमूर में पूछा हम दिल्ली कैसे पहुंच सकते हैं? इस पर पनशन जंग ने जवाब दिया कि दिल्ली पहुंचने से पहले तुम्हें मेरठ, लोनी और जुम्बा के किलों पर विजय प्राप्त करनी पड़ेगी । बिना इन किलो पर विजय प्राप्त करे, तुम दिल्ली तक नहीं पहुंच सकते । तैमूर ने पनशन जंग से फिर कहा - क्या तुम कुछ ऐसे विश्वासपात्र मार्गदर्शक मेरे साथ भेज सकते हो, जो मुझे दिल्ली तक पहुंचा सके? पनशन जंग बोला - अहोभाग्य सर आंखों पर । पनशन जंग ने अपने चार विश्वासपात्र मार्गदर्शकों को तैमूर के साथ दिल्ली भेजा ।

तैमूर ने मुल्तान से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया, परंतु उससे पहले उसने सुबह की नमाज पढ़ी । नमाज पढ़ने के दौरान उसे ढोल और बांसुरी की आवाज सुनाई दी । तम्बू से बाहर निकल कर देखा तो पास वाली बस्ती के कुछ लोग नहर की तरफ जनाजा लेकर जा रहे थे । जनाजे पर लाल रंग का कपड़ा डाला गया था, परंतु फिर भी लाश का चेहरा दिखाई दे रहा था । एक जवान औरत लाल कपड़े पहने हुए जनाजे के पीछे पीछे रोती हुई चल रही थी । जनाजे को नहर के किनारे ले गए ।

वहां कुछ लोगों ने ईंधन जमा करके रखा था । जनाजा उठाने वालों ने जनाजा ईंधन के ऊपर रख दिया, फिर रोती हुई उस जवान औरत के हाथ पांव जंजीर से बांध दिए । ढोल की आवाज भी बंद हो गई, लेकिन बांसुरी बजाने वाला कोई और धुन बजाने लगा । इसके बाद जंजीर से बंधी हुई उस औरत को उसी चिता पर लिटाया गया, और फिर आग दिखाई गई । आग लगने के बाद वह औरत पूरी तरह भड़क उठी । उस औरत की चीख जंगल में गूंजने लगी । कुछ देर के बाद हवा में जले हुए मांस की बुरी गंध फैल गई ।

मुल्तान से निकलने के बाद तैमूर ने मेरठ की तरफ प्रस्थान किया । मेरठ का किला एक टीले पर बना था । उस समय वहां का कोतवाल आलाशर था, जिसने तैमूर को रास्ता देने से इन्कार कर दिया । तैमूर ने आलाशर से बातचीत की, परंतु उसने तैमूर की एक भी बात नहीं मानी और युद्ध करने का निश्चय किया । तैमूर ने सेना को किले पर चढ़ाई करने का आदेश दिया । कुछ ही देर में तैमूर कै सैनिक किले में प्रवेश कर गए । नतीजा यह हुआ कि आलाशर के सिपाही भयभीत हो गए और हथियार डाल दिए । दोपहर की करीब आलाशर को कैद कर दिया गया ।

इसके बाद लोहे का एक पिंजरा बनवाया गया, जिसमें आलाशर को बंद किया गया । इसके बाद उस पिंजरे को आग के ऊपर रख दिया गया, परंतु कुदरत का ऐसा करिश्मा हुआ कि उसी समय भयानक बरसात होने लगी और आग बुझ गई । आग बुझने के बाद तैमूर को ऐसा लगा कि अल्लाह नहीं चाहता है इसकी हत्या की जाए, इसीलिए उसने आग बुझा दी । इसके बाद तैमूर ने आलाशर को मेरठ के किले में ही कैद कर दिया और वहां पर कुछ अपने सैनिक बिठा दिए । बाकी सेना के साथ तैमूर लोनी की तरफ प्रस्थान कर गया ।

लोनी का किला मेरठ के किले की तरह ही पहाड़ी पर बना हुआ था । उस समय लोनी के किले का कोतवाल करतार था । तैमूर ने अपने छोटे बेटे साद वकास जिसकी उम्र उस समय 18 वर्ष थी । तैमूर ने उसे 10 हजार सैनिकों की एक छोटी सी सेना का सेनापति बनाया | लोनी के किले को घेर के रखने की जिम्मेदारी दी, और कहा कि अगर यह जिम्मेदारी तूने पूरी नहीं की, तो फिर मैं तुझे छोड़ूंगा नहीं । साद वकास बोला - अमीर इत्मीनान रखिए मैं ऐसा करूंगा जो सोचा भी नहीं होगा । इसके बाद तैमूर अपनी सेना के साथ जुंबा किले की तरफ प्रस्थान किया, परंतु उसके मन में बार-बार यह विचार रहा था कि मैं अब अपने पुत्र को दोबारा देख नहीं पाऊंगा ।

साद वकास तैमूर का सबसे छोटा बेटा था, और सबसे छोटी संतान दूसरे बच्चों से ज्यादा प्यारी होती है, इसीलिए तैमूर का मन बार-बार विचलित हो रहा था । तैमूर ने बिना कुछ सोचे समझे ही अपनी सेना के साथ जुंबा किले की तरफ प्रस्थान किया । उधर करतार को यह मालूम चल गया था कि तैमूर की सेना ने मेरे किले को घेर के रखा है ।  करतार ने रात के अंधेरे में साद वकास के सैनिकों पर हमला कर दिया, जिसमें 2 सैनिक पकड़ लिए गए । उन दोनों सैनिकों को करतार ने बुरी यातनाएं दीं, और उनसे सारी जानकारी पूछ ली ।

करतार ने साद वकास के नेतृत्व वाली सेना पर हमला करने का निश्चय किया । रात होते ही करतार ने बहुत सारे हाथियों को साद वकास की छावनी में छोड़ दिया, जिससे उसके घोड़ों में भगदड़ मच गई, क्योंकि उसके घोड़ों/सैनिकों ने हाथियों को कभी देखा ही नहीं था । सेना भयभीत हो गई । साद वकास को आसानी से करतार के सिपाहियों ने बंदी बना लिया । अगले दिन बाद वकास को करतार के सामने लाया गया । करतार ने साद वकास से कहा - तू अपने बाप तैमूर को चिट्ठी लिख । उस चिट्ठी में उससे कह दे कि अपनी सेना लेकर इस देश से निकल जाए, वरना साद वकास की हत्या कर दी जाएगी ।

साद वकास बोला - मेरा बाप ऐसा नहीं है, जो अपने बेटे की जान बचाने के लिए अपनी सेना हिंदुस्तान से निकाल ले जाएगा । करतार बोला - ठीक है, तो मैं तेरे बाप को बेटे के मातम में बिठा देता हूं । साद वकास बोला - करतार मुझे मत मार । करतार बोला - मुझे किसी भी तरह तेरी हत्या करनी है, ताकि मैं उन लोगों का बदला ले सकूं जिनकी हत्या तेरे बाप ने मेरठ के किले में की है । इसके बाद साद वकास ने अपनी गर्दन सीधी करके कहा - तो ठीक है मेरा सर तन से जुदा कर दे । करतार बोला - मैं तेरा सिर तन से अलग नहीं करूंगा, क्योंकि मैं तेरा सिर शरीर से अलग करना ही नहीं चाहता हूं । साद वकास बोला - अच्छा तो तू मुझे किस तरह मारेगा? करतार बोला - मैं तेरा सीना चीर के उसमें से तेरा दिल निकाल लूंगा, फिर तेरे शरीर में भूसा भरूंगा और तेरी लाश को किले की मीनार पर लटका दूंगा ।

साद वकास बोला - करतार तू मुझे यातना देकर मत मार । इसके बाद करतार ने साद वकास का सीना चीर दिया और साद वकास चीख पड़ा । उसकी चीखें इतनी तेज थीं कि उसके छावनी तक सुनाई दे रही थी । छावनी में छुपे सैनिक उसकी चीखें सुन रहे थे, परंतु किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उसे बचाया जा सके । कुछ ही देर में साद वकास की चीखें शांत हो गईं, और करतार ने जल्लादों को आदेश दिया कि इसके शरीर में भूसा भरा जाए । भूसा भरने के बाद साद वकास की लाश को लोनी किले के ऊपर लटका दिया गया ।

उधर तैमूर अपनी सेना के साथ जुंबा केले के पास पहुंच गया, परंतु उसे साद वकास की हत्या का पता नहीं चला । जुंबा किला समतल जमीन पर बना हुआ था । उस समय हिंदुस्तान में जुंबा सांपों को कहा जाता था । तैमूर ने किले को देखा, उसके किले की रक्षक हिंदू औरतें थीं । उनके हाथ में कोई हथियार भी नहीं था । तैमूर को लगा की सैनिक किले में छुपे हुए हैं, और उन्होंने अपनी औरतों को आगे  कर दिया है । तैमूर ने जुंबा किले के पास ही अपनी छावनी लगाई, परंतु रात में सांपों ने उस पर हमला कर दिया । तैमूर के बहुत सारे सैनिक सांपों के द्वारा डस लिए गए ।

तैमूर ने किले की एक दीवार बारूद की सहायता से गिरा दी, और उसके कुछ सैनिक किले में अंदर प्रवेश कर गए । किले के अंदर कुछ हिंदू औरतें थीं, उनके हाथों में छोटे-छोटे डंडे थे । हर डंडे के ऊपर लाल रंग का कपड़ा लगा हुआ था, जिन्हें भी हिला रही थी और जुंबा जुंबा कह रही थी । तैमूर को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उसने द्विभाषिए को बुलाया और उन हिंदू औरतों से पूछा - कौन हो तुम और तुम्हारे पति कहां हैं? हिंदू औरतों ने जवाब दिया - हम ब्रह्मा समुदाय से हैं । मैंने स्वयं को विष्णु के लिए समर्पित कर दिया है, इसीलिए मैंने विवाह नहीं किया । तैमूर समझ गया कि वे सन्यासिनी हैं ।

तैमूर ने फिर पूछा - तुमने यह सांप क्यों पाल रखे हैं? औरतों ने जवाब दिया - कोई भी आक्रमणकारी इस किले के अंदर ना आ सके, इसीलिए मैंने असंख्य सांपों को इस किले में पाल रखा है । तैमूर समझ गया कि यह औरतें सन्यासी नहीं बल्कि किले की रक्षक हैं, और उन्होंने यह सांप मेरे सैनिकों को डसने के लिए पाल रखे हैं । तैमूर ने उन औरतों को पकड़ कर उसी किले में कैद कर दिया, और वहां पर अपने कुछ सैनिक छोड़ दिए ताकि उसके लौटने तक वह सैनिक किले की रक्षा कर सकें । जुंबा किले पर कब्जा करने के बाद तैमूर दिल्ली की ओर अपनी सेना लेकर प्रस्थान हुआ ।

तैमूर अपनी सेना के साथ दिल्ली के लिए से निकला ही था कि कुछ अछूत उससे मिलने आए । वो अछूत तैमूर की सेना में शामिल होना चाहते थे । तैमूर को लगा कि यह दुश्मन की चाल है । तैमूर ने उनसे पूछा - कौन हो तुम और मेरी सेना में क्यों शामिल होना चाहते हो? उन लोगों ने कहा - अमीर हम अछूत हैं । हम सबकी नजरों में नीच समझे जाते हैं । हम दूसरों का बचा कुचा खाना और हड्डियां खाते हैं । हमें कूड़ा करकट उठाने और गंदगी धोने के अलावा हिंदू कोई काम नहीं करने देते हैं । हम जान गए हैं तू यहां से दिल्ली पर अधिकार करने के लिए जा रहा है । हम तेरी सेना में शामिल होकर तेरी मदद करेंगे, इसके बदले में तू मुझे इतना खाना दे देना ताकि मेरे बच्चे भूखे ना रहे ।

तैमूर ने कहा - मैं हिंदुस्तान के उन इलाकों में तुम्हें जमीन दूंगा जहां मुसलमान रहते हैं ताकि तुम अपने बीवी बच्चों के साथ वहां रह सको । अछूतों से बातचीत करने के बाद तैमूर यजदा नाम के एक कस्बे में पहुंचा । जहां पर बहुत सारे ईरानी शरणार्थी रहते थे, जो अग्नि पूजक थे । तैमूर ने कुछ समय यजदा कस्बे में बिताया, और वहां से वह दिल्ली की तरफ प्रस्थान कर गया । अगली सुबह तैमूर दिल्ली पहुंचा । उस समय दिल्ली एक प्राचीर से घिरा हुआ था, और प्राचीर के पास बड़ी खाई खोदी गई थी जिसमें पानी भरा हुआ था ।

जब शाम हुई तो एक आदमी लाल कपड़े पहने हुए दिल्ली की प्राचीर पर दिखाई दिया ।

उसने हाथ उठाया और कहा - अमीर तैमूर? इसके बाद अमीर तैमूर ने जवाब दिया -  हां मैं हूं अमीर तैमूर । उसने फिर कहा - तू क्या करना चाहता है? तैमूर को उसकी भाषा समझ में नहीं आ रही थी उसने द्विभाषिए को बुलाया । द्विभाषिए ने बताया कि वह दिल्ली के सबसे बड़े मंदिर का ब्राह्मण है । इसके बाद तैमूर ने वहीं पर अपना शिविर लगाया । तैमूर अपने गुप्तचर को लोनी किले की जानकारी के लिए भेजा । गुप्तचर को जब मालूम हुआ कि साद वकास की हत्या कर दी गई है, तो वह डर गया । वापस तैमूर के पास आया और कुछ नहीं बोला । तैमूर ने कहा डर मत, जो तुझे मालूम है बता दे । गुप्तचर ने बताया कि  कोतवाल करतार ने तेरे बेटे की हत्या कर दी ।

इसके बाद तैमूर ने दिल्ली की प्राचीर को बारूद से तहस-नहस कर दिया । तैमूर ने अपने सरदारों को आदेश दिया । दिल्ली को जीतने के बाद वहां जो कुछ मिलेगा, उसके मालिक तुम हो । जो जवान सामने आए उसे अपना गुलाम बना लो । इसी तरह जो औरत तुम्हें पसंद आएं, उन पर अधिकार कर लो । तैमूर का दामाद कुर्रा खान समझ गया था कि हमें क्या करना है । इसके बाद दिल्ली की प्राचीर पर ब्राह्मण फिर से दिखाई दिया और तैमूर से बोला - अगर दिल्ली पर हमला किया तो तेरी उम्र घट जाएगी, और तू जल्द ही किसी मुसीबत में पड़ जाएगा । तैमूर ने जवाब दिया - मैं दुश्मन से डरने वाला नहीं हूं, मौत सिर्फ एक बार आती है ।

इसके बाद तैमूर ने अपना युद्धवेस पहना, सिर पर टोप रखा, एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी ली और घोड़े पर सवार हो गया । सैनिकों से कहा चलो आगे बढ़ो । इसके बाद कुछ हिंदू सैनिकों ने तैमूर का रास्ता रोका । तैमूर उन सिपाहियों के बीच में कूद गया, और दोनों हाथों से उन हिंदू सैनिकों पर वार करने लगा । तैमूर ने उन सभी सैनिकों को मार डाला और शहर में प्रवेश कर गया । तैमूर के पीछे उसका दामाद कुर्रा खान बहुत सारे सैनिकों के साथ दिल्ली शहर में प्रवेश कर गया । जैसे ही शहर के लोगों को इसकी सूचना हुई, तो लोग चीखने पुकारने लगे । औरतें विलाप करने लगीं । बच्चों के रोने लगे और हिंदू सैनिकों के तेज आवाज वाले शोर ने ऐसा हंगामा किया कि उसका वर्णन तैमूर ने अपनी आत्मकथा में नहीं कर पाया ।

तैमूर अपनी सेना के साथ आगे बढ़ता गया, कुछ ही देर में तैमूर का पूरा शरीर खून से लथपथ हो गया । उसने अपने आसपास अपने विश्वासपात्र सैनिकों को पाया और जोर से बोला - तुम आज पवित्रता के सबसे ऊंचे स्थान पर पहुंच गए हो, क्योंकि तुमने रक्त से स्नान किया है । किसी भी शूरवीर के लिए रक्त से स्नान करना बहुत ही सौभाग्य की बात होती है । तैमूर ने जब अपने हाथों की तरफ देखा तो उसके दोनों हाथ बुरी तरह घायल हो चुके थे, पैरों से खून निकल रहा था । तैमूर ने लड़ाई की कमान अपने दामाद कुर्रा खान को सौंप दी । कुछ समय बाद तैमूर बेहोश हो गया, जब उसकी आंख खुली तो उसने स्वयं को शल्य चिकित्सक के पास पाया ।

कुर्रा खान ने दिल्ली शहर के अनेक हिस्सों को आग के हवाले कर दिया, ताकि हिंदू सैनिक अपने परिवार को बचाने के लिए निकल जाएं और तैमूर के सैनिक आसानी से किले पर अधिकार कर लें । कुर्रा खान का यह तरीका काम कर गया, और उसने आसानी से दिल्ली के किले पर अधिकार कर लिया । घायल अवस्था में तैमूर ने कुर्रा खान को आदेश दिया कि जब तक मल्लू इकबाल और महमूद खिलजी बंदी ना बनाए जाएं, तब तक शहर से किसी को भागने न दिया जाए । उनकी गिरफ्तारी के बाद बूढ़े आदमियों, बच्चों और औरतों को शहर से जाने दिया जाए । मगर जबान मर्दों और औरतों को बाहर जाने से रोका जाए क्योंकि उन्हें गुलाम और लौंडिया बनाया जाएगा ।

कुछ ही समय बाद कुर्रा खान ने मल्लू इकबाल और महमूद खिलजी को बंदी बना लिया । इसके बाद तैमूर के लिए तख्त लाया गया, और उसे उस पर लेटा कर मल्लू इकबाल के महल में ले जाया गया । तैमूर इस युद्ध में इतना घायल हो गया था कि खड़ा भी नहीं हो सकता था । तैमूर 3 दिन तक मल्लू इकबाल के महल में ही रहा, क्योंकि दिल्ली के वातावरण में इतना धुआं छा गया था, कि बाहर निकलना भी बहुत मुश्किल हो गया था । कुछ समय बाद कुर्रा खान दौड़ता हुआ आया, और तैमूर से बोला - अमीर तेरे सैनिकों को उल्टी और दस्त हो रहे हैं । हकीम से पूछा तो वह कह रहा है कि कोई महामारी है, इसका इलाज संभव नहीं है ।

उस समय तैमूर को क्वेटा के सुल्तान अब्दुल्ला वली उल मुल्क की याद आई । उसने कहा था - तू दिल्ली को तो जीत सकता है, परंतु वहां की महामारी से नहीं जीत सकता । महामारी का नतीजा देखकर कुर्रा खान बोला - अमीर अगर यहां रुका तो तेरे सारे सैनिक इस महामारी से मारे जाएंगे । अब इसके सिवा कोई और रास्ता नहीं है कि हम दिल्ली से निकल जाएं । तैमूर के बहुत सारे सैनिक महामारी की चपेट में आ गए थे । तैमूर उन्हें छोड़कर जाना नहीं चाहता था, लेकिन उसके सिवा तैमूर के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था । तैमूर ने उस ब्राह्मण को बुलाया जो बार-बार दिल्ली की प्राचीर पर आकर तैमूर को डराता था । तैमूर ने उस ब्राह्मण से पूछा - क्या नाम है तेरा? ब्राह्मण ने जवाब दिया - गानी होरता । तैमूर ने ब्राह्मण से अपने नाम का मतलब पूछा - ब्राह्मण बोला - मेरे नाम का अर्थ पवित्र अग्नि है ।

इसके बाद तैमूर ने मल्लू इकबाल, महमूद खिलजी और उस ब्राह्मण को बंदी बनाया । दिल्ली से बाहर निकलने का निश्चय किया, परंतु बहुत सारे अछूत फिर से तैमूर के पास आए और कहने लगे कि मुझे भी अपने साथ ले चलो, वरना यह हिंदू मेरे ऊपर जुल्म करते रहेंगे । उनका जुल्म दिन रात बढ़ता ही जाता है । हमारी जमीनों पर कब्जा कर लिया है । हमें ना तो खेती करने देते हैं और ना ही चैन से जीने देते हैं । तुम हमें अपने साथ ले चलो, हम इस्लाम कुबूल कर लेंगे । तैमूर ने क्वेटा के सुल्तान वली उल मुल्क को संदेश भिजवाया कि मेरे साथ बहुत सारे अछूत आ रहे हैं । उनके लिए खेती और घर का इंतजाम करो, सारा खर्चा मैं दूंगा ।

इसके बाद उन अछूत हिंदुओं को क्वेटा के सुल्तान वली उल मुल्क ने अपने यहां घर और जमीन दिए । बाद में सभी अछूतों ने इस्लाम को कबूल कर लिया था । तैमूर अपनी सेना के साथ वापस लौटा और लोनी के किले पर पहुंचा । तैमूर ने दूर से देखा, किले के ऊपर उसके बेटे साद वकास की लाश की हुई थी । तैमूर को अत्यधिक क्रोध आया, और उसने लोनी के किले पर सीधा आक्रमण कर दिया । उस किले में करतार अपने सैनिकों के साथ मौजूद था । करतार अपने सैनिकों के साथ बहादुरी से लड़ा । तैमूर ने करतार को देखते ही उस पर इतनी ताकत से हमला किया कि उसके हाथ से तलवार छूट गई । जैसे ही करतार की तलवार हाथ से छूटी और वह उस तलवार को उठाने नीचे झुका, तो तैमूर ने उसकी पीठ पर कुल्हाड़ी मार दी, जिससे उसकी रीड की हड्डी कट गई और वह नीचे गिर गया ।

करतार के नीचे गिरते ही तैमूर ने उसका एक पैर पकड़ कर उसे घसीटना शुरू कर दिया और किले से बहुत दूर ले गया । करतार की आंखें खुली थी । वह सब कुछ देख रहा था परंतु कुछ कर नहीं सकता था क्योंकि रीड की हड्डी कट जाने के बाद व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है । तैमूर को किले पर अपने बेटे की लाश दिखाई दे रही थी । तैमूर को क्रोध आया और उसने करतार का सर धड़ से अलग कर दिया । तैमूर ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, किले में मौजूद सारे सैनिकों की हत्या कर दी जाए | इसके बाद तैमूर के सैनिकों ने किले में मौजूद सभी हिंदुस्तानी सैनिकों की हत्या कर दी । हत्या करने के बाद सभी सैनिकों के सिर धड़ से अलग कर दिए गए । तैमूर के आदेश पर उन सिरों को इकट्ठा करवा कर उनका ढेर बनाया गया । उसी ढेर के ऊपर करतार की लाश को टांग दिया गया । तैमूर ने अपने बेटे की लाश को किले से नीचे उतार कर वहीं दफना दिया ।

तैमूर ने हिंदुस्तान से लूटे हुए धन से एक भी पैसा नहीं लिया । सारा पैसा अपने सैनिकों और सरदारों में बांट दिया । तैमूर वसंत ऋतु में समरकंद पहुंचा, जहां पर उसने अपने मकबरे का निर्माण करवाने हेतु आदेश दिया ।  हिंदुस्तान पर विजय हासिल करने के बाद तैमूर ने शाहरुख को अपना उत्तराधिकारी बनाया । उससे कहा मल्लू इकबाल, महमूद खिलजी और ब्राह्मण गानी होरता को मैं तुझे शॉप रहा हूं । इनके साथ अच्छा व्यवहार करना, जिस चीज की इन्हे जरूरत हो, उन्हें भिजवा देना । अगर तुझे ऐसा लगे कि वे शराब पीना चाहते हैं, और सुंदर स्त्रियों के साथ आनंद उठाना चाहते हैं, तो तू उन्हें रोकना मत क्योंकि तेरा दुश्मन जितनी ज्यादा शराब पिएगा और जितना समय सुंदर स्त्रियों के साथ बताएगा | उतना ही तेरे लिए फायदेमंद होगा ।

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