अलबेरुनी की भारत यात्रा का पूरा वर्णन | Alberuni history in hindi |

 

तहकीक ए हिंद ग्रंथ का परिचय

*अलबेरूनी के द्वारा लिखी गई पुस्तक तहकीक ए हिंद को किताब उल हिंद या भारत की खोज के नाम से भी जाना जाता है ।

*अलबेरूनी ने तहकीक ए हिंद को अरबी भाषा में लिखा था जिसमें भारतीय समाज और संस्कृति की जानकारी प्रदान की गई है ।

*अलबेरूनी ने तहकीक ए हिंद की रचना अप्रैल 1030 से दिसंबर 1031 के मध्य गजनी (आधुनिक अफगानिस्तान में) में की थी ।

*1885/86 में अलबेरूनी के भारत यात्रा विवरण तहकीक ए हिंद को अरबी भाषा में पहली बार प्रकाशित किया गया था ।

*1888 में भारतीय अंग्रेजी सरकार ने एक जर्मन विद्वान डॉ. एडवर्ड सचौ से तहकीक ए हिंद का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाया था ।

*तहकीक ए हिंद का हिंदी भाषा में अनुवाद संतराम बीए के द्वारा किया गया था, जिसमें उनकी सहायता प्रोफ़ेसर एसएन दास गुप्त, महेश प्रसाद, पंडित राजा राम शास्त्री आदि ने किया था ।

*संतराम बीए के इस कार्य को प्रोत्साहित करने के लिए उस समय कि पंजाब सरकार ने ₹200 और इंदौर की महाराजा होल्कर हिंदी कमिटी ने ₹60 प्रदान किए थे ।

अलबेरूनी का इतिहास

*अलबेरूनी का पूरा नाम अबू रेहान मुहम्मद इब्न अहमद अलबेरूनी था ।

*अलबेरूनी का जन्म सितंबर 973 . में ख्वारिज्म के निकट बेरूनी नामक स्थान पर हुआ था ।

*अलबेरूनी विज्ञान और साहित्य का अच्छा विद्वान था । उसके इसी गुड़ से प्रभावित होकर ख्वारिज्म के मामूली वंशीय शासक मामू ने अपना राज्य मंत्री बनाया था ।

*1016-17 . में गजनी के शासक महमूद ने ख्वारिज्म पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया । उसी समय अलबेरूनी को बंदी के रूप में महमूद पकड़ कर लाया ।

*इतिहासकार कहते हैं कि महमूद विद्वानों का बहुत सम्मान करता था, और उसके दरबार में अलबेरूनी के अलावा तारीख ए यामिनी का रचयिता अल उत्बी, तारीख ए मसूदी का रचयिता अल बैहाकी, शाहनामा का रचयिता फिरदौस आदि विद्वान रहते थे ।

*भारतीय ग्रंथों का अध्ययन करने वाला पहला मुस्लिम विद्वान अलबेरूनी को ही माना जाता है ।

*अलबेरूनी ने 20 से भी ज्यादा किताबों की रचना की थी, जिसमें सबसे प्रसिद्ध किताब तहकीक ए हिंद मानी जाती है ।

*अलबेरूनी का पहला शिक्षक बंदादुल सरसनी तथा दूसरा शिक्षक अबू नसर मंसूर बिन अली इराक था । अलबेरूनी के ये दोनों शिक्षक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे ।

*महमूद गजनबी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मसऊद शासक बना, जो अलबेरूनी का बहुत सम्मान करता था । मसऊद ने अलबेरूनी के लिए गजनी में ज्योतिष संबंधी ज्ञान के लिए एक मान मंदिर का निर्माण करवाया था ।

*अलबेरूनी के द्वारा लिखी गई पुस्तक अल कानून मसऊदी महमूद के उत्तराधिकारी मसऊद को ही समर्पित है ।

*अलबेरूनी ने सांख्य दर्शन, पतंजलि की पुस्तक, बृहत्संहिता, लघुजातकम्, गीता आदि भारतीय ग्रंथों का अरबी में अनुवाद किया था ।

*अलबेरूनी भारत आने से पहले पंचतंत्र और चरक संहिता का अरबी में अनुवाद पढ़ चुका था ।

*अल्फलैला (सहसृजनी चरित्र), कलीला और दिमना जैसी बौद्ध कथाओं का अरबी में अनुवाद किया गया था ।

*अलबेरूनी ने बौद्ध सन्यासियों को मुहम्मिर लिखा हुआ है ।

*अलबेरूनी ने कनिष्क के द्वारा बनवाया गया पेशावर में एक विशाल स्तूप देखा था ।

*अलबेरूनी ने लाहौर से आगे का भारत नहीं देखा था । अलबेरूनी ने अपने तहकीक ए हिंद में भारत का आंखों देखा वर्णन नहीं किया है, क्योंकि पंजाब से आगे अलबेरूनी गया ही नहीं था । संभवत: लाहौर में बैठकर उसने भारतीय ग्रंथों का अरबी में अनुवाद किया ।

*अरबी साहित्य की नींव 750 से 850 . के मध्य बगदाद में रखी गई, जिसमें अब्बास कुल के खलीफाओं का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है ।

*अरबियों का निजी ज्ञान पैगंबर मुहम्मद और उनसे संबंधित इतिहास ही माना जाता है । बाकि सारा ज्ञान अरबियों ने बौद्धों और हिंदुओं से लिया है ।

*786 - 808 . के मध्य बगदाद के शासकों ने बल्ख के बौद्ध विहारों से अनेक बौद्ध विद्वानों को अपने यहां शिक्षा प्रदान करने के लिए आमंत्रित किया था । अरब निवासी बल्ख में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे ।

*सर्फ विद्या, विष विद्या, पशु चिकित्सा, तत्वज्ञान, तर्क विद्या, आचार शास्त्र, राजनीति, युद्ध विद्या, बुद्ध की जीवनी जैसे अनेक बौद्ध ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद पहले ही हो चुका था ।

*सितंबर 1048 ईस्वी में अलबेरूनी की मृत्यु हो गई थी ।

अलबेरूनी की भारत यात्रा

पहला परिच्छेद

हिंदू धार्मिक शास्त्रार्थ में कभी अपने प्राण, शरीर, संपत्ति आदि को जोखिम में नहीं डालते । इसके विपरीत उनका सारा पक्षपात उन लोगों के विरुद्ध कार्य करता है, जो विदेशी हैं । हिंदू विदेशियों को म्लेच्छ अर्थात अपवित्र कहकर पुकारते हैं । पूर्वकाल में खुरासान, ईरान, इराक, मोसुल और शाम का सारा प्रांत बौद्ध धर्म का अनुयायी था परंतु जरदुश्त ने आजर बायजान से जाकर मजूसी मत का प्रचार किया तो उसकी शिक्षा सम्राट गुस्तास्प को पसंद आई ।

इसीलिए उसके पुत्र असफंदयार ने बल और संधियों के द्वारा इस नवीन मत को पूर्व और पश्चिम में फैला दिया था । उसने अपने पूरे साम्राज्य में पारसी धर्म को राज धर्म घोषित कर दिया था । बौद्धों को वहां से बल्ख की तरफ जाना पड़ा । हिंदुओं और विदेशियों के मध्य अत्यधिक विवाद है । हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि मूर्खता एक ऐसा रोग है, जिसकी कोई औषधि नहीं । हिंदुओं का यह विश्वास है कि उनके देश के समान और कोई देश नहीं ।

उनकी जाति के समान और कोई जाति नहीं । उनके सम्राटों के समान कोई दूसरा सम्राट नहीं । उनके धर्म के समान कोई दूसरा धर्म नहीं । उनकी विद्या के समान कोई दूसरी विद्या नहीं । हिंदू बड़े अहंकारी और मंद बुद्धि के लोग हैं । उनके पास जो ज्ञान है वह दूसरों को नहीं बताते हैं । वराहमिहिर नामक एक बड़ा विद्वान लोगों को ब्राह्मणों का सत्कार करने का उपदेश देता हुआ कहता है - यवन यानि यूनानी लोग म्लेच्छ अर्थात अपवित्र हैं, फिर भी उनका सत्कार करना चाहिए क्योंकि उन्होंने सभी प्रकार की विधाएं पड़ी हैं ! उन विद्याओं में वे दूसरों से बहुत आगे बढ़ गए हैं ।

दूसरा परिच्छेद                                                                  

हिंदू परमात्मा को एक अनादि, अनंत, सर्व शक्तिमान, सृष्टि का कर्ता मानते हैं । पतंजलि की पुस्तक में शिष्य पूछता है - वह कौन सा देव है जिसके पूजन से सुख की प्राप्ति होती है । गुरु उत्तर देता है ये वह देव है जो नित्य और अद्वितीय होने के कारण किसी मानुषी कर्म की आवश्यकता नहीं रखता । मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार वह स्वर्ग और नरक देता है । सब लोग स्वर्ग की कामना करते हैं । नरक के भयानक होने के कारण, सब लोग उससे भयभीत रहते हैं । बुद्धि उस तक नहीं पहुंच सकती । निज स्वभाव से उसका ज्ञान किया जा सकता है ।

शिष्य फिर कहता है - क्या ऊपर कहे विशेषणों के अलावा उसके और कुछ गुण भी हैं? गुरु उत्तर देता है - वह सर्वोच्च है, आकाश की दृष्टि से नहीं बल्कि विचार की दृष्टि से । वह संपूर्ण सृष्टि से भी महान है । वह परम आनंद है जिसकी प्राप्ति की लालसा प्रत्येक प्राणी करता है । अलबेरूनी आगे लिखता है - हिंदू उसे ईश्वर कहते हैं अर्थात जो परिपूर्ण, हितकारी और बिना कुछ लिए हमें अनेक प्रकार की वस्तुएं प्रदान करता है । हिंदू केवल परमात्मा की एकत्व को स्वीकार करते हैं ।

तीसरा परिच्छेद

सूफ़ का अर्थ ज्ञानी है क्योंकि यूनानी भाषा में सूफ़ प्रज्ञा को कहते हैं । इसी से तत्ववेता को पैलासोफ़ा अर्थात ज्ञान का प्रेमी कहा जाता है । इस्लाम में जब लोगों ने तत्ववेताओं के सिद्धांतों से मिलती-जुलती बहुत सी बातों को ग्रहण किया तो साथ ही उनका नाम भी वही रहने दिया । किंतु बहुत से लोगों ने इस शब्द का अर्थ ना समझने के कारण इसे अरबी भाषा शब्द सुफ़ा के साथ मिला दिया । मानो मुहम्मद साहब के साथियों में जो लोग अहलस्सुफ़ा कहलाते थे वही सूफ़ी हैं ।

साफ़ी अर्थात पवित्र हो । यही साफ़ी बिगड़ कर सूफ़ी हो गया और अब विचारकों के एक संप्रदाय को सूफ़ी संप्रदाय कहा जाता है ।

अलबेरूनी ने आगे लिखा है वासुदेव गीता में कहते हैं - सच पूछो तो सब पदार्थ ब्रह्मा के रूप है । विष्णु ने ही पृथ्वी का रूप धारण किया है ताकि प्राणी मात्र उस पर रह सकें । वह अग्नि और वायु के रूप में प्रकट हुए हैं । वही प्रत्येक प्राणी का ह्रदय है ।

आठवां परिच्छेद

देव - इनके अधिकार में उत्तर दिशा है । इनका हिंदुओं से विशेष संबंध है । लोग कहते हैं कि जरदुश्त ने देवों का नाम पुण्य आत्मा (श्रमण) रख दिया था, जिन्हें शमनिया अर्थात बौद्ध लोग जिन्हें देव समझते हैं । दैत्य दानव - दैत्य दानव अर्थात पापात्माएं जो दक्षिण में रहती है । हिंदू धर्म के विरोधी और गौ हत्या करने वाले हैं । इनमें और देवों में बड़ा समीप का संबंध है फिर भी इनमें परस्पर लड़ाई रहती है । ब्रह्मा, इंद्र, प्रजापति जातियों के नाम नहीं बल्कि व्यक्तियों के नाम है ।

ब्रह्मा और प्रजापति का अर्थ एक ही है तथा उनके अलग-अलग नाम किसी गुण के कारण है । इंद्र लोकों का राजा है । वासुदेव यक्ष और राक्षस पापात्माओं की जाति में गिने जाते हैं । हिंदू कहते हैं कि देवों की संख्या 33 कोटि या करोड़ है, जिनमें से 11 महादेव भी हैं । पुण्य आत्माओं का कुल जोड़ 33,00,00,000 है । इसके अतिरिक्त देवता खाते-पीते, भोग विलास करते, जीते और मरते हैं क्योंकि वे प्रकृति के अंदर हैं । चाहे वह प्रकृति अति सूक्ष्म और अति सरल ही क्यों ना हो ।

साथ ही उन्होंने यह जन्म कर्मों द्वारा पाया है ना कि ज्ञान द्वारा । पतंजलि की पुस्तक कहती है कि नंदीकेश्वर ने महादेव के नाम पर बहुत से यज्ञ किए, जिनके कारण वह मनुष्य देह के साथ ही स्वर्ग में भेज दिया गया । हिंदू महादेव को शंकर कहते हैं, जिनका प्रसिद्ध नाम रुद्र है । उनका काम विनाश और प्रलय करना है । मिस्र देश का राजा नैक्टानी बुस अपनी राजधानी छोड़कर मकदूनिया में पहुंचे गया । वहां का राजा फिलिप ज्योतिष तथा भविष्य कथन में व्यस्त था ।

राजा नैक्टानी बुस ने राजा फिलिप की रानी ओलंपिया के साथ छल किया । राजा नैक्टानी बुस ने स्वयं को देवता का अवतार बताकर ओलंपिया के साथ संभोग किया, जिससे सिकंदर पैदा हुआ । इस बात का पता जब फिलिप को चला तो उसने पिता होने से इन्कार कर दिया । यूनानियों के ग्रंथ इस प्रकार की बातों से भरे पड़े हैं ।

नवां परिच्छेद

ब्राह्मण - ब्राह्मणों के विषय में हिंदू पुस्तकें कहती हैं कि ये ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए हैं । हिंदू जिस शक्ति को माया कहते हैं उसका दूसरा नाम ब्रह्मा ही है । इसी कारण सभी हिंदू ब्राह्मणों को मानव जाति में सबसे सर्वोच्च मानते हैं ।

क्षत्रिय - यह ब्रह्मा के कंधों और हाथों से उत्पन्न हुए हैं ।

वैश्य - जो ब्रह्मा की जांघों से उत्पन्न हुए हैं ।

शूद्र - जो ब्रह्मा के पांव से उत्पन्न हुए हैं ।

शिल्पकार - धुनिए, मोची, टोकरी बनाने वाले, ढाल बनाने वाले, मांझी, मछुआरे, अहेरिए, जुलाहे । इन सभी जातियों की गिनती शूद्र वर्ण में नहीं की जाती है । इनकी गिनती शिल्पकारों में होती है ।

अछूत - हाड़ी, चांडाल और बधतौ (बघौती) । इन जातियों को भी शुद्र वर्ण में शामिल नहीं किया जाता है । इन जातियों का कर्म गांव की सफाई करना और मेला उठाना है । लोकमत के अनुसार इन जातियों को शूद्र पिता और ब्राह्मणी माता से उत्पन्न हुई संतान माना जाता है ।

ग्यारहवां परिच्छेद

मुल्तान में सूर्य को समर्पित एक आदित्य की मूर्ति थी । वह मूर्ति लकड़ी की बनी थी और उस मूर्ति को लाल चमड़े से मढ़ा गया था । जब मुहम्मद बिन कासिम ने मुल्तान को जीता तो उसने पूछा कि यह शहर इतना ऐश्वर्यवान क्यों है? मुल्तान के लोगों ने आदित्य की मूर्ति के बारे में बताया । कासिम ने मूर्ति को वहीं पर रहने दिया परंतु उसके गले में गौ मांस का एक टुकड़ा लटका दिया और उस स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण करवा दिया ।

थानेश्वर नगरी के लिए हिंदुओं के हृदय में पूजा का बड़ा भाव है । वहां की मूर्ति का नाम है चक्रास्वामिन अर्थात चक्र का स्वामी । यह मूर्ति पीतल की बनी है और मनुष्य के बराबर लंबी चौड़ी है । वराहमिहिर ने कहा है - विष्णु की मूर्ति के या तो 8 हाथ बनाओ, या 4, या दो हाथ बनाओ और छाती के नीचे श्री स्त्री की मूर्ति बनाओ । यदि 8 हाथ बनाओ तो दाहिने हाथ में एक कृपाण । दूसरे में सोने या लोहे की गदा ।

तीसरे में बाण पकड़ाओ, चौथे हाथ को ऐसा बनाओ मानो जल खींच रहा हो । बाएं हाथों में धनुष, चक्र, और शंख पकड़ाओ । यदि नारायण के भाई बलदेव की मूर्ति बनानी हो तो उसके कानों में कुंडल चाहिए । नारायण और बलदेव दोनों की मूर्ति बनाओ तो उसके साथ उनकी बहन भगवती को भी मिला दो । ब्रह्मा की मूर्ति के चारों ओर चार मुख होते हैं और वह कमल के ऊपर बैठी होती है । इंद्र की मूर्ति के हाथ में एक शस्त्र होता है जिसे हीरे का वज्र कहते हैं । महादेव की मूर्ति बनानी हो तो उनके सिर पर एक अर्धचंद्र बनाओ । बुद्ध की मूर्ति बनानी हो तो मुखमंडल सुंदर बनाओ ।

उनके हाथ पांव की रेखाएं कमल के जैसी हो, उन्हें कमल पर बैठा हुआ दिखलाओ । बाल सफेद हों । आकृति बड़ी शांत हो, मानो वह सृष्टि का पिता हो । अरहंत (महावीर स्वामी) की मूर्ति बनाओ जो बुद्ध के शरीर का दूसरा रूप है । उसे एक नंगे युवा के रूप में दिखलाओ, जिसका मुख शोभायुक्त और सुंदर हो । मृत्यु के देवता यम की मूर्ति भैंस पर सवार होती है और उसके हाथ में एक गदा होनी चाहिए । यदि 7 माताओं की मूर्ति बनानी हो तो उनमें से सभी को एक मूर्ति में इकट्ठा दिखलाओ । ब्राह्मणी के चारों दिशाओं में चार मुख हों । कौमारी के 6 मुख । वैष्णवी के चार हाथ ।

वाराही का सिर सूअर और शरीर मनुष्य के समान । इंद्राणी की अनेक आंखें और उनके हाथ में गदा । भगवती अर्थात दुर्गा साधारण लोगों की तरह बैठी हों । चामुंडा कुरूपा, दांत आगे बढ़े हुए हों । विष्णु की मूर्ति के पुजारी भागवत जाति के लोग हैं | सूर्य की मूर्ति के पुजारी पारसी लोग हैं | महादेव की मूर्ति की पूजा वो साधु करते हैं जो लंबे लंबे केश रखते हैं । शरीर पर विभूति लगाते हैं, मुर्दों की हड्डियां लटकाते हैं तथा कपालों में भोजन करते हैं । ब्राह्मण अष्ट माताओं की पूजा करते हैं । समण बुद्ध की पूजा करते हैं । नग्न लोग अरहंत की पूजा करते हैं ।

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